जामनगर भाजपा में अंदरूनी कलह सतह पर... ?



जामनगर भाजपा में अंदरूनी कलह सतह पर... ? 

*नई संगठनात्मक नियुक्तियों पर विधायक रिवाबा जडेजा की चुप्पी ने खड़े किए सवाल*


भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हमेशा से ही एक अनुशासित और कैडर-आधारित पार्टी माना जाता रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह कहावत मशहूर है कि भाजपा 'व्यक्ति' से नहीं, बल्कि 'संगठन' से चलती है। जब संगठन मजबूत होता है, तो चुनाव के दौरान नेताओं और उम्मीदवारों की राह आसान हो जाती है क्योंकि जमीनी स्तर का काम पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता संभाल लेते हैं। लेकिन गुजरात के जामनगर में, जो भाजपा का गढ़ माना जाता है, आजकल हवा का रुख कुछ बदला हुआ नजर आ रहा है।

जामनगर भाजपा में नई संगठनात्मक नियुक्तियों के बाद से ही सियासी पारा चढ़ा हुआ है। शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि क्या जामनगर उत्तर की विधायक और क्रिकेटर रवींद्र जडेजा की पत्नी, रिवाबा जडेजा, पार्टी के नए संगठनात्मक ढांचे से खुश नहीं हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि नई नियुक्तियों की घोषणा के 15 दिन बीत जाने के बाद भी उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

*सोशल मीडिया पर सन्नाटा: नाराजगी का संकेत...?*

आज के डिजिटल युग में, राजनेताओं के लिए सोशल मीडिया अपनी बात रखने और जनसंपर्क का सबसे सशक्त माध्यम है। जामनगर भाजपा के नए शहर संगठन की घोषणा होते ही पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने तत्काल अपनी प्रतिक्रिया दी।

जामनगर की सांसद पूनम बेन माडम और 79-जामनगर दक्षिण के विधायक दिव्येश अकबरी ने बिना देर किए फेसबुक और ट्विटर (X) जैसे प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से नवनियुक्त पदाधिकारियों को बधाई और शुभेच्छा संदेश भेजे। यह एक सामान्य शिष्टाचार और पार्टी अनुशासन का हिस्सा माना जाता है।




हालाँकि, इसके ठीक विपरीत, पहली बार विधायक बनीं रिवाबा जडेजा की सोशल मीडिया टाइमलाइन पर सन्नाटा पसरा हुआ है। घोषणा के बाद दो हफ्ते से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन उनकी तरफ से संगठन को लेकर एक भी बधाई संदेश पोस्ट नहीं किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय शहरी जनों के बीच यह चुप्पी चर्चा का विषय बन गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह महज व्यस्तता है या इसके पीछे कोई गहरी नाराजगी छिपी है?

*क्या अपने समर्थकों की अनदेखी से नाराज हैं मंत्री जी...?*

जामनगर के राजनीतिक हलकों में दबी जुबान में यह चर्चा है कि नए संगठन में रिवाबा जडेजा के करीबी या चुनिंदा कार्यकर्ताओं को जगह नहीं मिली है। माना जा रहा है कि अपने वफादारों को पद न मिलने के कारण विधायक नाराज हैं और यही वजह है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से शुभेच्छा देने से दूरी बना ली है।
यह स्थिति इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि भाजपा ने रिवाबा जडेजा को राजनीति में आते ही बहुत कुछ दिया है। उन्हें सीधा विधायक का टिकट मिला और पहली बार में ही मंत्री पद (या महत्वपूर्ण जिम्मेदारी) से नवाजा गया—एक ऐसा मौका जो दशकों तक पार्टी की सेवा करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को भी नसीब नहीं होता। ऐसे में, जब पार्टी ने उन्हें इतना सम्मान दिया है, तो संगठन के निर्णयों पर इस तरह की कथित नाराजगी पार्टी के अनुशासनात्मक ढांचे पर सवाल खड़े करती है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में थे, तब पार्टी में "संगठन ही सर्वोपरि है" का नारा बुलंद था। लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए लगता है कि जामनगर में अब माहौल बदल चुका है और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं संगठन के अनुशासन पर हावी होती दिख रही हैं।

*तस्वीरों की राजनीति: शहर अध्यक्ष और विधायक के बीच नाराजगी*

विधायक रिवाबा जडेजा और जामनगर भाजपा शहर अध्यक्ष बीनाबेन कोठारी के बीच की नाराजगी अब किसी से छिपी नहीं है। यह शीत युद्ध अब सार्वजनिक कार्यक्रमों और तस्वीरों में भी साफ नजर आने लगा है।

रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम का उदाहरण इस बात की तस्दीक करता है। इस कार्यक्रम में विधायक, पूर्व प्रमुख और अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी एक साथ मंच साझा करते नजर आए। सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई तस्वीरों में सभी नेता साथ दिख रहे हैं, लेकिन शहर अध्यक्ष बीनाबेन कोठारी फ्रेम से गायब हैं। वहीं, पार्टी के अन्य लोगों ने जो तस्वीरें पोस्ट कीं, उनमें अध्यक्ष की उपस्थिति साफ दिखाई देती है। यह "फोटो पॉलिटिक्स" स्पष्ट इशारा करती है कि सब कुछ सामान्य नहीं है। यह जानबूझकर की गई अनदेखी है या महज संयोग, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इसने पार्टी के भीतर गुटबाजी की खबरों को हवा जरूर दी है।



आगामी निगम चुनाव और कार्यकर्ताओं का मनोबल
इस आपसी कलह का सबसे बुरा असर आने वाले जामनगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (मनपा) के चुनावों पर पड़ सकता है।

कुछ ही दिनों बाद निकाय चुनाव होने वाले हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस बार कई पुराने और दिग्गज नेताओं के टिकट कट सकते हैं और नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। ऐसे में अगर मौजूदा विधायकों और संगठन के बीच तालमेल नहीं रहा, तो नाराजगी और बगावत का सुर तेज हो सकता है।

हालांकि यह सच है कि भाजपा को अक्सर उम्मीदवार के चेहरे से ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर वोट मिलते हैं और पार्टी सत्ता में आ भी जाती है। लेकिन, चुनाव जिताने में असली भूमिका उन कार्यकर्ताओं की होती है जो दिन-रात पसीना बहाते हैं। यदि शीर्ष नेतृत्व और विधायकों के बीच ही तनातनी रहेगी, तो कार्यकर्ता भी हतोत्साहित होंगे। कार्यकर्ता अपने नेताओं से कम से कम समर्थन और शुभेच्छा की अपेक्षा तो रखते ही हैं।

*क्या शीर्ष नेतृत्व करेगा हस्तक्षेप...?*

वर्तमान में जामनगर भाजपा के अंदर जो कुछ चल रहा है, वह पार्टी की 'अनुशासित' छवि के विपरीत है। शहर भर में विधायक जी की नाराजगी की चर्चा है, लेकिन डर या अनुशासन के कारण कोई भी कार्यकर्ता खुलकर बोलने को तैयार नहीं है।

पत्रकार कल्पेश रावल ने अपनी रिपोर्ट में सही ही सवाल उठाया है कि आखिर यह नाराजगी कब तक चलेगी...?

आने वाले चुनाव एक अग्निपरीक्षा होंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव के दौरान कौन सा ग्रुप किसके साथ खड़ा होता है, किसे टिकट मिलता है, और कौन खुलकर बगावत करता है। फिलहाल, जामनगर में भाजपा का अंदरूनी घमासान सतह पर आ चुका है, और अगर इसे समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो इसका परिणाम पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।


कल्पेश रावल 
पत्रकार एवं संपादक

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