"बिना इंश्योरेंस गाड़ी नहीं चला सकते, पर अनपढ़ और क्रिमिनल नेता देश चलाएंगे"
'अनपढ़ और क्रिमिनल नेता चलाएंगे देश, पर बिना इंश्योरेंस नहीं चलेगी गाड़ी': जन-आक्रोश या प्रशासनिक विरोधाभास ? भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र के दोहरे मापदंडों पर आज समाज के हर वर्ग में एक तीखी बहस छिड़ चुकी है। सोशल मीडिया से लेकर चाय की चौपालों और बौद्धिक मंचों तक एक सवाल तेजी से गूंज रहा—*"जिस देश में एक आम नागरिक बिना गाड़ी के इंश्योरेंस, हेलमेट या ड्राइविंग लाइसेंस के सड़क पर नहीं उतर सकता, उसी देश में अरबों की आबादी का भविष्य तय करने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए न तो किसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की जरूरत है और न ही बेदाग चरित्र की बाध्यता।"* यह तुलना केवल एक चुटकुला या सोशल मीडिया का मीम भर नहीं है, बल्कि यह आम भारतीय नागरिक के उस गहरे दर्द और आक्रोश को दर्शाती है जो रोजमर्रा की जिंदगी में कड़े कानूनों का पालन करता है, भारी-भरकम चालान भरता है, लेकिन संसद और विधानसभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि और अशिक्षित नेताओं की मौजूदगी देखकर खुद को ठगा सा महसूस करता है। ## आम नागरिक पर नियमों का शिकंजा, नेताओं को छूट ? भारत में मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Ac...