सोशल मीडिया पर पिछडे BJP मंत्री
गुज सोशल मीडिया पर पिछड़ेरात BJP और सरकार के लिए अलर्ट: क्या Gen-Z की नाराजगी अब सोशल मीडिया पर दिखने लगी है ?
गुजरात की राजनीति में सोशल मीडिया अब सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि नेताओं की लोकप्रियता और जनता के मूड को समझने का एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बन चुका है। ऐसे समय में गुजरात भाजपा और सरकार से जुड़े कुछ प्रमुख चेहरों के सोशल मीडिया फॉलोअर्स में कथित गिरावट को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसे लेकर सवाल उठने लगा है कि क्या युवा वर्ग, खासकर Gen-Z, भाजपा के डिजिटल नैरेटिव से दूरी बनाने लगा है?
हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गुजरात के कुछ प्रमुख भाजपा नेताओं और मंत्रियों के सोशल मीडिया फॉलोअर्स में पिछले कुछ महीनों के दौरान कमी आई है। रिपोर्ट में हर्ष संघवी, रिवाबा जडेजा, जीतू वघाणी, अर्जुन मोढवाडिया, कुंवरजी बावलिया और अन्य नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट्स में फॉलोअर्स घटने का दावा किया गया है। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि किए जाने की आवश्यकता है और केवल फॉलोअर्स की संख्या में बदलाव को सीधे तौर पर राजनीतिक समर्थन में कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
रील से रियल तक पहुंचा सवाल
गुजरात की भाजपा सरकार के कई नेता सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं। इंस्टाग्राम रील्स, वीडियो संदेश, कार्यक्रमों की झलकियां और राजनीतिक गतिविधियों के विजुअल्स के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश लगातार होती रही है।
लेकिन अब यही सोशल मीडिया रणनीति सवालों के घेरे में दिखाई दे रही है। आलोचकों का कहना है कि जनता, विशेषकर युवा वर्ग, सिर्फ अच्छी तरह तैयार किए गए वीडियो और रील्स नहीं देखना चाहता। वह रोजगार, शिक्षा, महंगाई, भर्ती, सड़क, ट्रैफिक, सरकारी सेवाओं और रोजमर्रा की समस्याओं पर ठोस जवाब चाहता है।
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर 'रील बनाम रियल काम' की बहस जोर पकड़ती दिखाई दे रही है।
सोशल मीडिया पर किसी नेता की लोकप्रियता का अर्थ केवल उसके फॉलोअर्स की संख्या नहीं होता। लेकिन जब कोई नेता लगातार डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी राजनीतिक पहुंच का प्रमुख माध्यम बनाता है, तब फॉलोअर्स, लाइक्स, कमेंट्स और शेयर जैसे आंकड़े उसकी डिजिटल स्वीकार्यता का एक संकेत जरूर बन सकते हैं।
रिवाबा से लेकर हर्ष संघवी तक चर्चा
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रिवाबा जडेजा के सोशल मीडिया फॉलोअर्स में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। इसी तरह हर्ष संघवी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स में भी कमी का दावा किया गया है। जीतू वघाणी, कुंवरजी बावलिया और अन्य नेताओं के सोशल मीडिया प्रदर्शन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया फॉलोअर्स का बढ़ना या घटना कई कारणों पर निर्भर करता है। किसी प्लेटफॉर्म द्वारा फर्जी या निष्क्रिय अकाउंट हटाए जाने, यूजर व्यवहार बदलने, एल्गोरिदम में बदलाव या कंटेंट की पहुंच घटने से भी फॉलोअर्स प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए इन आंकड़ों को सीधे चुनावी समर्थन में बदलाव के बराबर रखना जल्दबाजी होगी।
फिर भी राजनीतिक रूप से यह चर्चा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा स्वयं अब Gen-Z और युवा मतदाताओं तक पहुंचने के लिए विशेष रणनीति पर काम कर रही है।
भाजपा ने खुद बनाई Gen-Z आउटरीच टीम
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने हाल ही में Gen-Z और युवा मतदाताओं से संवाद बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष टीम गठित की है। इस टीम में भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन, स्मृति ईरानी, विनोद तावड़े के साथ गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी और अन्य नेताओं को शामिल किया गया है।
इस पहल का उद्देश्य युवाओं के साथ सीधा संवाद स्थापित करना, उनकी अपेक्षाओं और समस्याओं को समझना तथा पार्टी और युवा मतदाताओं के बीच संपर्क को मजबूत करना बताया गया है।
यानी एक तरफ सोशल मीडिया पर नेताओं की लोकप्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा स्वयं यह मानकर आगे बढ़ रही है कि युवा पीढ़ी के साथ संवाद को और मजबूत करने की जरूरत है।
क्या Gen-Z सचमुच भाजपा से दूर हो रहा है?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
Gen-Z को किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी समर्थक मानना आसान नहीं है। यह पीढ़ी सोशल मीडिया पर तेजी से सूचनाएं प्राप्त करती है, अलग-अलग विचारों को देखती है और राजनीतिक नेताओं से तुरंत प्रतिक्रिया की अपेक्षा रखती है।
युवा मतदाता के लिए केवल पार्टी की विचारधारा या नेता की लोकप्रियता पर्याप्त नहीं हो सकती। वह यह भी देखता है कि उसके जीवन से जुड़े सवालों पर सरकार क्या कर रही है।
रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, सरकारी भर्ती, शिक्षा की गुणवत्ता, स्टार्टअप और व्यवसाय के अवसर, महंगाई, शहरी सुविधाएं और डिजिटल पारदर्शिता जैसे मुद्दे युवाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए यदि किसी नेता की रील को लाखों व्यू मिलते हैं, लेकिन उसी पोस्ट के कमेंट सेक्शन में युवा रोजगार या भर्ती परीक्षा को लेकर सवाल पूछ रहे हैं, तो राजनीतिक दलों के लिए उस प्रतिक्रिया को समझना जरूरी है।
'रील के राजा' वाली आलोचना क्यों?
आलोचना का सबसे बड़ा केंद्र यही है कि क्या जनप्रतिनिधियों का सोशल मीडिया प्रदर्शन उनकी वास्तविक प्रशासनिक भूमिका पर भारी पड़ रहा है?
जनता की अपेक्षा यह रहती है कि मंत्री और जनप्रतिनिधि समस्याओं के समाधान के लिए मैदान में दिखाई दें। यदि किसी क्षेत्र में सड़क खराब है, बेरोजगार युवा भर्ती की मांग कर रहे हैं, किसी परीक्षा को लेकर विवाद है या सरकारी कार्यालय में लोगों की समस्या लंबित है, तो जनता स्वाभाविक रूप से चाहती है कि उसका प्रतिनिधि वहां मौजूद हो।
यहीं से 'रील नहीं, रियल काम' का संदेश निकलता है।
सोशल मीडिया प्रचार अपने आप में गलत नहीं है। आज के दौर में सरकार और नेताओं के लिए डिजिटल कम्युनिकेशन जरूरी है। लेकिन सोशल मीडिया की चमक और जमीन पर काम के बीच संतुलन बिगड़ने पर वही प्रचार उलटा असर भी डाल सकता है।
RSS की बैठक और युवा मुद्दों पर चर्चा
हाल ही में गुजरात भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों की RSS पदाधिकारियों के साथ बैठक भी हुई, जिसमें Gen-Z से जुड़े मुद्दों और अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव पर संभावित प्रभाव वाले विषयों पर चर्चा की खबर सामने आई।
यह घटनाक्रम बताता है कि युवा वर्ग और नई पीढ़ी की राजनीतिक भूमिका को लेकर भाजपा के भीतर भी गंभीरता बढ़ी है।
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर देखें तो आने वाले समय में गुजरात की राजनीति में सोशल मीडिया और युवा मतदाता दोनों निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
फॉलो बटन से वोटिंग मशीन तक का सफर
सोशल मीडिया पर किसी नेता को 'अनफॉलो' करना और चुनाव में उसे वोट न देना—दोनों अलग-अलग चीजें हैं। इसलिए वर्तमान फॉलोअर्स में गिरावट को सीधे चुनावी परिणाम का संकेत मानना सही नहीं होगा।
लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह एक चेतावनी संकेत जरूर हो सकता है।
यदि युवा वर्ग लगातार यह महसूस करता है कि उसके सवालों का जवाब सिर्फ वीडियो, पोस्ट और रील्स में मिल रहा है, जबकि वास्तविक समस्याएं जस की तस हैं, तो डिजिटल लोकप्रियता लंबे समय तक राजनीतिक समर्थन में नहीं बदल पाएगी।
गुजरात भाजपा के सामने अब चुनौती सिर्फ सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने की नहीं है। चुनौती यह है कि वह सोशल मीडिया पर उठने वाले सवालों को जमीन पर कार्रवाई में कितनी तेजी से बदलती है।
असली परीक्षा अब शुरू
Gen-Z को प्रभावित करने के लिए ट्रेंडिंग ऑडियो, आकर्षक वीडियो और शानदार कैमरा एंगल काफी नहीं होंगे। नई पीढ़ी नेताओं से सवाल पूछेगी, जवाब मांगेगी और उनके दावों की तुलना जमीनी हकीकत से करेगी।
भाजपा ने Gen-Z तक पहुंचने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान शुरू कर दिया है और उसमें गुजरात के हर्ष संघवी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।
अब देखना यह होगा कि यह अभियान केवल सोशल मीडिया रणनीति बनकर रह जाता है या वास्तव में युवाओं के मुद्दों को सुनने और उनके समाधान की राजनीतिक प्रक्रिया को मजबूत करता है।
क्योंकि आज की राजनीति में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने लोगों ने नेता को फॉलो किया।
सवाल यह भी है कि कितने लोग उस नेता की बात पर भरोसा करते हैं।
और शायद यही वह आईना है, जिसे सोशल मीडिया पर 'रील के राजा' बनने की दौड़ में लगे नेताओं को अब गंभीरता से देखना होगा।
जनता रील भी देखती है और रियलिटी भी।
फॉलो भी करती है और जरूरत पड़ने पर अनफॉलो भी।
लेकिन चुनाव के दिन उसका फैसला सोशल मीडिया की स्क्रीन नहीं, वोटिंग मशीन करती है।
कल्पेश रावल
पत्रकार एवं संपादक







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